उज्जैन के खड़े हनुमान हिल क्यों नहीं रहे:शिला के नीचे ऐसा क्या है? मंदिर टूट गया, क्रेन भी फेल; टस से मस नहीं हुई प्रतिमा
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उज्जैन के खड़े हनुमान मंदिर का पूरा ढांचा तोड़ा जा चुका है, लेकिन अंदर खड़ी प्रतिमा हिली तक नहीं । चार बार कोशिश हुई, हाइड्रोलिक क्रेन तक लगाई गई, फिर भी नाकामी हाथ लगी। अब...
उज्जैन के खड़े हनुमान मंदिर का पूरा ढांचा तोड़ा जा चुका है, लेकिन अंदर खड़ी प्रतिमा हिली तक नहीं । चार बार कोशिश हुई, हाइड्रोलिक क्रेन तक लगाई गई, फिर भी नाकामी हाथ लगी। अब प्रशासन ने कार्रवाई रोक दी है। वहीं भक्त इसे चमत्कार मान रहे हैं और मध्य प्रद . आखिर प्रतिमा हट क्यों नहीं रही, जमीन के नीचे है क्या और अब आगे क्या होगा; समझते हैं आज के मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में... सवाल 1: उज्जैन में चल क्या रहा है, अब तक क्या-क्या हुआ? जवाब: कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ी की जा रही है, इसी रास्ते में ‘खड़े हनुमान’ मंदिर आ रहा है, जिसे विस्थापित करना है। मंदिर की बाहरी संरचना हटाई जा चुकी है, लेकिन 8 फीट ऊंची प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली। 30 अगस्त से प्रतिमा हटाने की कोशिशों और विरोध का सिलसिला चला। हाइड्रोलिक क्रेन तक लगाई गई, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ सका। करीब डेढ़ फीट खुदाई के बाद भी नींव नहीं मिली। अब प्रतिमा की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वैज्ञानिक जांच की जा रही है। प्रशासन कह रहा है कि प्रतिमा हटाने की कोई कोशिश हुई ही नहीं, जबकि मंदिर से जुड़े लोग इसके वीडियो सबूत होने का दावा कर रहे हैं। मंदिर टूटने के बाद ‘खड़े हनुमान’ की मूर्ती को टेंट से ढंक दिया गया है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। सवाल 2: क्या यह हजार साल पुरानी प्रतिमा है, और इससे फर्क क्या पड़ता है? जवाब: प्रतिमा की उम्र को लेकर दो बिल्कुल अलग दावे हैं... पहला, परंपरागत दावा, 150 से 170 साल मंदिर की सेवा एक ही पुजारी परिवार की पांच पीढ़ियां करती आई हैं। दस्तावेजों में इसका इतिहास 1857 के दौर से जुड़ा मिलता है, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में यह 150 तो कुछ में 200 साल तक बताया गया है। दूसरा, बिल्कुल नया दावा, करीब 1000 साल विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी के मुताबिक प्रतिमा मालवा बेसाल्ट की है और यह परमार वंश-राजा भोज के दौर की हो सकती है। हालांकि सिंदूर की मोटी परत के कारण इसकी मूल आकृति साफ नहीं दिखती, इसलिए सिर्फ देखकर उम्र तय नहीं की जा सकती। रिटायर्ड आर्कियोलॉजिस्ट बीके लोखंडे कहते हैं कि- अगर प्रतिमा सामान्य धार्मिक प्रतिमा निकली तो उसे दूसरी जगह ले जाने पर फैसला हो सकता है। लेकिन पुरातात्विक महत्व साबित हुआ तो संरक्षण और उसे संभालने का तरीका अलग होगा। यानी 150 या 1000 साल का सवाल सिर्फ उम्र का नहीं है। अगर प्रतिमा सच में प्राचीन निकली, तो उसे हटाने का तरीका भी बदल जाएगा। सवाल 3: प्रतिमा के नीचे ऐसा क्या है, जो उसे हिलने नहीं दे रहा? जवाब: विशेषज्ञों के मुताबिक- संभावना यह है कि प्रतिमा और उसके नीचे की चट्टान आपस में जुड़ी हुई हों। जियोलॉजिकल एक्सपर्ट डॉ. डी.आर. तिवारी के मुताबिक, क्रेन से इतनी बड़ी-बड़ी चीजें जड़ से उखड़ जाती हैं, पर यह नहीं हिली, इसका मतलब है कि मूर्ति और नीचे की चट्टान एक ही रॉक है। जब तक डिटेल सीस्मिक सर्वे नहीं होगा, यह साफ नहीं होगा कि उस पत्थर की कंटिन्यूटी जमीन में कहां तक है। बी.के. लोखंडे का कहना है कि- अगर मूर्ति और बेस एक ही पत्थर के हैं, तो कंटिन्यूटी सौ फीसदी वहीं तक होगी, यानी यह जड़ से पकड़ी हुई है। उनके मुताबिक ऐसी शैलकृत (रॉक-कट) प्रतिमाओं के देश में कई उदाहरण हैं, जैसे कार्ला और भाजा की गुफाएं, जिन्हें कभी स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इसी वजह से अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और IIT इंदौर की टीम जमीन के भीतर की संरचना स्कैन कर रही है, इसके लिए ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) जैसी तकनीक का इस्तेमाल होगा, ताकि बिना खुदाई किए यह समझा जा सके कि शिला और आसपास के पत्थर ठीक कैसे जुड़े हैं और असल गहराई कितनी है। बिना यह समझे जोर लगाना प्रतिमा में दरार या टूटने का खतरा बढ़ा सकता है। एक्सपर्ट्स ऐसा कुछ होने की आशंका जता रहे हैं। उनका मानना है कि प्रतिमा एक चट्टान को तराश कर बनाई गई होगी। सवाल 4: क्या प्रतिमा को बिना नुकसान पहुंचाए दूसरी जगह ले जाया जा सकता है? जवाब: विशेषज्ञ एक बात पर एकमत हैं, प्रतिमा को काटना या तोड़ना किसी भी सूरत में विकल्प नहीं है। लोखंडे कहते हैं, काटने का प्रावधान कोई भी पुरातत्वविद् सुझाएगा ही नहीं, प्रतिमा को डैमेज करने की बात कभी नहीं कही जाएगी। नीचे की शिला भी प्रतिमा का ही हिस्सा मानी जाएगी, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो। एक संभावित रास्ता यह है कि शिला के चारों ओर सावधानी से खुदाई कर पूरी संरचना को एक साथ निकाला जाए। पहले प्रशासन ने इंदौर के इंजीनियरिंग कॉलेज SGSITS से मदद मांगी, फिर मामला IIT इंदौर तक पहुंचा। टीम खास उपकरणों से प्रतिमा की गहराई और आसपास की मिट्टी-पत्थर की संरचना जांच रही है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि क्रेन-जेसीबी से प्रयास करने से पहले यह तकनीकी आकलन क्यों नहीं कराया गया। फिलहाल के लिए नई जगह पहले से तय है, छत्री चौक के पास टंकी चौक पर एक पुरानी बावड़ी के करीब, पुजारी की सहमति से वहां चबूतरा भी तैयार हो रहा है। तब तक प्रतिमा को नुकसान से बचाने के लिए उसके ऊपर टेंट और कैनोपी लगाकर बैरिकेडिंग कर दी गई है। सवाल 5: सड़क चौड़ी करने की जरूरत ही क्यों पड़ी, अब आगे क्या होगा? जवाब: सड़क चौड़ी करने की वजह है 2028 का सिंहस्थ मेला। कंठाल से गोपाल मंदिर के बीच की सड़क अभी 9 मीटर चौड़ी है, इसे बढ़ाकर 15 मीटर किया जा रहा है, ताकि सिंहस्थ में उमड़ने वाली भीड़ को संभाला जा सके। इसी हिस्से में कुल 4 धार्मिक स्थल आए, बाकी तीनों बिना बड़ी अड़चन के शिफ्ट हो चुके हैं, सिर्फ खड़े हनुमान की प्रतिमा ही ऐसी है जिसमें परेशानी आ रही है। स्थानीय लोग इसे 'डॉक्टर हनुमान' और मंदिर को 'उज्जैन का एम्स' कहते हैं, मान्यता है कि यहां बीमार बच्चों की मन्नतें पूरी होती हैं, पुजारी के मुताबिक हिंदू ही नहीं, मुस्लिम परिवार भी यहां मन्नत मांगने आते हैं। भक्तों और साधु-संतों की मांग है कि प्रतिमा के साथ जबरदस्ती न हो, कई लोगों ने महाकाल की आगामी सवारी तक विस्थापन टालने की मांग रखी है। मंदिर परिसर में रोज की तरह आरती जारी है, श्रद्धालुओं की भीड़ पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है, कई इसे चमत्कार मानकर दर्शन करने पहुंच रहे हैं। आगे का रास्ता अब पूरी तरह ASI और IIT इंदौर की तकनीकी रिपोर्ट पर टिका है। रिपोर्ट आने के बाद ही तय होगा कि प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से कैसे निकाला जा सकता है। प्रशासन के स्तर पर यह विकल्प भी चर्चा में है कि अगर प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से निकालना संभव नहीं हुआ, तो सड़क के डिजाइन में बदलाव कर इस हिस्से को बचाया जाए। उज्जैन के कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक की सड़क अभी 9 मीटर चौड़ी है, इसे बढ़ाकर 15 मीटर किया जा रहा है। मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर का ये एपिसोड भी पढ़िए… क्या बालाघाट प्रशासन कुछ छिपा रहा है?:ढाई महीने में 30+ आदिवासी बच्चों की मौत जून के आखिरी हफ्ते से मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में एक के बाद एक बैगा और गोंड आदिवासी बच्चे मर रहे हैं। सरकार ने पहले कहा, सिर्फ 8 मौतें। गांव वाले, स्थानीय नेता और विपक्ष कहते रहे, आंकड़ा कहीं ज्यादा है। ढाई महीने बाद अब यह आंकड़ा 30 पार कर चुका है, और सैकड़ों बच्चे अब भी बीमार हैं… पूरा एक्सप्लेनर पढ़िए। Source: Dainik Bhaskar
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