बांग्लादेश को पानी देने पर लालू-संजय झा भिड़े:कौन सही, कौन झूठा, JDU गंगा का पानी क्यों नहीं बांटना चाहती, अब क्या करेंगे मोदी
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'जब 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार ने बांग्लादेश के साथ गंगा के पानी के बंटवारे का समझौता किया था, तब लालू यादव केंद्र में प्रभावशाली नेता थे। अगर बिहार सरकार ने इसका मजबूती से...
'जब 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार ने बांग्लादेश के साथ गंगा के पानी के बंटवारे का समझौता किया था, तब लालू यादव केंद्र में प्रभावशाली नेता थे। अगर बिहार सरकार ने इसका मजबूती से विरोध किया होता तो राज्य को बाढ़ और सूखे का सामना नहीं करना पड़ता।' . 20 अगस्त को JDU नेता और राज्यसभा सांसद संजय झा ने अखबारों में लेख लिखकर और इंटरव्यू देकर लालू यादव पर निशाना साधा। इस पर RJD सुप्रीमो लालू यादव ने इशारों-इशारों में उन्हें नौसिखिया बताया। लालू यादव सच बोल रहे या संजय झा, JDU क्यों संधि खत्म कराना चाहती है, अगर मोदी ने मांग नहीं मानी तब क्या होगा, समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1: संजय झा का लालू यादव पर किया गया दावा क्या सच है? जवाब: इससे समझने के लिए आपको 30 साल पीछे चलना होगा। 12 दिसंबर 1996। दिल्ली के आसमान में कोहरा छाया था और कड़ाके की सर्दी थी। हालांकि, राजनीतिक गर्मी बढ़ी हुई थी। बांग्लादेश की नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री शेख हसीना दिल्ली दौरे पर थीं। दोनों प्रधानमंत्रियों एचडी देवगौड़ा और शेख हसीना ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया, जिसका नाम था भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि। उस वक्त इंद्रकुमार गुजराल भारत के विदेश मंत्री थे। India's Foreign Policy: Retrospect and Prospect नामक अपनी किताब में सुमित गांगुली लिखते हैं, ‘गुजराल ने सरकार को सुझाव दिया था कि भारत को अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसियों (जैसे-बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका) को बिना किसी तुरंत फायदे की उम्मीद के एकतरफा और बड़ा दिल दिखाते हुए रियायतें देनी चाहिए। ताकि क्षेत्रीय विश्वास और शांति कायम हो सके।’ गांगुली अपनी किताब में आगे लिखते हैं, ‘गुजराल की इसी सिद्धांत का नतीजा था बांग्लादेश के साथ गंगा जल संधि।’ गुजराल के सुझाव को बाद में ‘गुजराल सिद्धांत’ नाम दिया गया। लालू की मौन सहमति, मंत्री ने जताया था विरोध भारत और बांग्लादेश के बीच जब यह जल संधि हुई थी तब भारतीय राजनीति का संक्रमण काल था। 1996 लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिली थी। कांग्रेस और CPI-M के बाहर से समर्थन देने की बदौलत 13 पार्टियों की संयुक्त मोर्चे की सरकार थी। एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे और उनकी पार्टी जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव थे। लालू यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री भी थे। संधि के वक्त लालू यादव ने मुखर रूप से ना समर्थन किया था और ना ही विरोध। इसे बाद में लालू यादव की मौन सहमति मानी गई। 12 दिसंबर 1996 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा और बांग्लादेश की तत्कालीन PM शेख हसीना ने संधि पर साइन किया था। तस्वीर उसी दौरान की है। (फोटो सोर्स-Getty Images) हालांकि… बिहार सरकार ने इस संधि का उस वक्त विरोध किया था। तब के सिचांई मंत्री जगदानंद सिंह ने भारत सरकार को पत्र लिखकर विरोध जताया था। बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग की पुस्तक 'गंगा नदी में जल उपलब्धता में हो रही कमी, अंतरराष्ट्रीय संधि के दुष्प्रभाव' के मुताबिक, तत्कालीन सिंचाई मंत्री जगदानंद सिंह ने 13 दिसंबर 1996, 20 जनवरी 1997 को पत्र लिखा और संधि पर चिंता जताई। 20 जनवरी 1997 को देश के तत्कालीन जल संसाधन मंत्री जनेश्वर मिश्र को लिखे लेटर में जगदानंद सिंह कहते हैं, 'भारत-बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल के बंटवारे पर एक समझौता हो गया और इस राज्य को इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। 13 दिसंबर 1996 को आप पटना आए। इस दौरान भी हमने इस समझौते पर राज्य की गंभीर चिंता से आपको अवगत कराया था। उस एकरारनामे की अधिकारिक प्रति भारत सरकार से हमें अभी तक नहीं मिली है। अनौपचारिक रूप से सूचना मिली है।' पॉलिटिकल एनालिस्ट डॉ. आनंद प्रकाश शुक्ल कहते हैं, ‘राजनीतिक रूप से देखें तो सच है कि उस वक्त लालू यादव बहुत प्रभावशाली थे। जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। अगर वह मुखरता से विरोध करते तो हो सकता था कि देवगौड़ा सरकार संधि से पीछे हट जाती।’ लालू ने शेयर किया 2011 का वीडियो 22 अगस्त की शाम लालू यादव ने X पर लिखा- ’फरक्का बैराज पर JDU के ऐसे नौसिखिए बोल रहे हैं, जिन्हें इस मुद्दे का कोई इतिहास-भूगोल मालूम नहीं है। JDU के नौसिखियों को ज्ञानार्जन के लिए RJD शासन के सिंचाई मंत्री जगदा भाई (जगदानंद सिंह) के केंद्र सरकार के साथ पत्राचार को पढ़ना चाहिए।' लालू यादव ने इस पोस्ट के साथ संसद में दिए गए अपने भाषण का क्लिप भी पोस्ट किया है। जिसमें वह फरक्का बैराज को तोड़ने और संधि को खत्म करने की डिमांड कर रहे हैं। हमारी (भास्कर की) जांच में लालू यादव का यह वीडियो 19 दिसंबर 2011 को संसद में दिए गए भाषण का है। मतलब संधि से करीब 14 साल बाद का। 23 अगस्त को JDU प्रवक्ता नीरज कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, 'चारा घोटाले में जेल जाने के डर से लालू यादव ने फरक्का जल समझौते पर बिहार के हितों की बली चढ़ा दी। तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल से अच्छे संबंध होने के बावजूद उन्होंने संधि के विरोध में कोई आवाज नहीं उठाई।' देवगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने में लालू यादव का बड़ा हाथ माना गया था। तस्वीर प्रधानमंत्री पद के लिए देवगौड़ा के चयन के बाद की है। उस वक्त लालू यादव जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। सवाल-2: JDU गंगा जल संधि को क्यों खत्म कराना चाहती है? जवाबः इसके 2 बड़े कारण हो सकते हैं… 1. नीतीश के एजेंडे को आगे बढ़ाने का मैसेज नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री नहीं है, लेकिन उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री हो चुकी है। पार्टी हर मौके पर अपने को नीतीश कुमार के पद चिह्नों पर आगे बढ़ने की बात कहती है। बांग्लादेश गंगा जल संधि की समीक्षा करने और फरक्का बैराज को तोड़ने की डिमांड नीतीश कुमार बीते करीब 2 दशकों से करते रहे हैं। इसी साल दिसंबर में संधि की समय-सीमा खत्म हो रही है। अब जब नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से थोड़े अलग हैं तो पार्टी ने उनके इस मुद्दे को थोड़ा बदलाव कर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। पॉलिटिकल एनालिस्ट डॉ. शुक्ला कहते हैं, ‘ऐसा करने से लोगों के बीच यह मैसेज जाएगा कि JDU अभी भी जमीन पर अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाए हुए है और नीतीश कुमार के मुद्दों पर ही चलने को तैयार है।’ 2. बाढ़ को मुद्दा बनाकर JDU को मजबूत करना बिहार सरकार के मुताबिक, राज्य के टोटल 94,163 वर्ग किलोमीटर भौगोलिक क्षेत्र में से लगभग 68,800 वर्ग किलोमीटर यानी 73 फीसदी हिस्सा बाढ़ से प्रभावित है। इससे राज्य की 76% आबादी हर साल जूझती है। संजय झा का तर्क है कि बांग्लादेश जल संधि को खत्म करने से बिहार का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ से बच सकता है। गंगा नदी में फरक्का बैराज के कारण काफी गाद जमा हो गया है, जिससे उसकी सतह ऊंची हो गई है। इससे सहायक नदियों का पानी उसमें नहीं आ पाता है। जिससे बाढ़ का दायरा बढ़ जाता है। इस मुद्दे को उठाकर JDU एक तीर से दो निशाना साध रही है। अगर मोदी सरकार ने संधि में JDU की डिमांड मान ली तो वह प्रचार करेगी कि हमारे प्रयास से ही बाढ़ का स्थायी समाधान खोजा जा रहा है। हम पर आप लोग भरोसा करें। अगर मोदी सरकार ने JDU की बात नहीं मानी तो वह लोगों के बीच जाकर कह सकती है हमने अपने स्तर से काफी प्रयास किया। यह एडवांटेज RJD के पास नहीं है। क्योंकि जब संधि हुई थी तब लालू यादव ही सत्तारुढ़ दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। सवाल-3: क्या मोदी सरकार जल संधि को आगे कंटिन्यू नहीं करेगी? जवाबः अभी कुछ भी कहना मुश्किल है। लेकिन ज्यादा संभव है कि संधि आगे जारी रहेगी। 21 अगस्त को भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘गंगा जल संधि से जुड़े मुद्दों सहित बांग्लादेश के साथ नदी से संबंधित मुद्दों पर तकनीकी स्तर पर चर्चा जारी है।’ भारत सरकार का कहना है कि नया समझौता तैयार करते समय हम 4 पॉइंट का खास ख्याल रखेंगे। नए जल प्रवाह के आंकड़े देखे जाएंगे। जलवायु परिवर्तन का असर देखा जाएगा। भारत के अंदर पानी की जरूरतों को ध्यान में रखा जाएगा। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे संबंधित राज्यों से सलाह ली जाएगी। बांग्लादेश नए समझौते में मांग रहा गारंटी बांग्लादेश गंगा जल संधि में भारत से ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल करने की मांग कर रहा है। 18 अगस्त को बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने ढाका में कहा कि जरूरत पड़ने पर बांग्लादेश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठा सकता है। बांग्लादेश का कहना है कि मौजूदा संधि सूखे मौसम में उसकी जरूरत के मुताबिक पानी उपलब्ध नहीं कराती है। इसलिए वह नई संधि में ऐसा प्रावधान चाहता है, जिससे भारत निश्चित मात्रा में पानी की आपूर्ति की गारंटी दे। इसी के तहत बांग्लादेश ‘गारंटी क्लॉज’ में न्यूनतम जल प्रवाह तय करने की मांग कर रहा है। सवाल-4: अगर संधि आगे बढ़ी तो क्या JDU मोदी सरकार से अलग होगी? जवाबः संभावना लगभग न के बराबर है। पॉलिटिकल एनालिस्ट प्रियदर्शी रंजन कहते हैं, 'गठबंधन की राजनीति में इस तरह के बयान अक्सर राज्य के हित, राजनीतिक जमीन मजबूत करने और केंद्र पर दबाव बनाने के लिए दिए जाते हैं, न कि सरकार गिराने की चेतावनी के रूप में।' 'JDU नेता खुद स्वीकार कर रहे हैं कि अंतिम फैसला केंद्र का है और वे राज्य की चिंताओं को संसदीय व कूटनीतिक मंचों पर मजबूती से दर्ज कराना चाहते हैं।' समर्थन वापस नहीं लेने का मजबूत कारण यह भी... 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 240 सीटों पर जीती थी। BJP की अगुवाई वाले NDA गठबंधन में चंद्रबाबू नायडू की TDP के 16, नीतीश कुमार की पार्टी JDU के 12, शिवसेना (शिंदे गुट) के 7, LJP (रामविलास) के 5 और अन्य दलों के 12 सांसद भी शामिल थे। ये आंकड़ा बहुमत से 20 ज्यादा यानी 292 होता है। 14 जून को TMC नेता काकोली घोष दस्तीदार समेत लोकसभा 20 सांसद NDA समर्थित नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी से जुड़ गए, जिससे लोकसभा में BJP का नंबर 292 से बढ़कर 312 हो गया है। अब इसमें से अगर JDU के 12 सांसद घट भी गए तब भी मोदी सरकार के पास 300 सांसद होंगे, जो बहुमत 272 से 28 ज्यादा हैं। Source: Dainik Bhaskar
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